Monday, August 9, 2010

याद

रात के 2 बज रहे हैं... मैं अपने पंप के रूम में बेड पे लेटा हुआ हूँ| आज धुलेंडी हैं| दिल में एक याद अपने बीबी बच्चों की| मुझे याद हैं वो दिन...पिछ्ले साल का..! उस दिन भी होली की धुलेंडी थी| मेरी शादी के बाद पहली होली...! मैं उन यादों में खोया हुवा हूँ| क्या खूब होली खेला था मैं अपनी बीबी और बच्चे के साथ..! पूरे नवोदय के कॅंपस में होली चल रही थी| स्कूल के बच्चे मस्ती के साथ एक दूसरे के उपर रंग डाल रहे थे| हम पति पत्नी भी अपने बच्चे के साथ होली खेलने बाहर निकल आए| खूब रंग उड़ाया! गुलाल का तो मानो बादल छा गया था कॅंपस में| मेरा बेटा अंशुल काफ़ी स्मार्ट हैं...! उसने औरों को रंग लगाने से पहले हम दोनों के चरण स्पर्श किए, हम दोनों को गुलाल लगाया, और फिर पता नही उस नन्हे शैतान को अचानक क्या सूझा...! हमें कहा की अब आप एक दूसरे को गुलाल लगाओ...हेहेहे...क्या शरमा गयी थी वीनू उस दिन जैसे कल ही हुमारी शादी हुई हो| उस दिन की एक एक याद दिल मे बसी हैं| आज भी होली हैं! पर मैं अकेला हूँ...अपने परिवार से सैकड़ों मैल दूर...! दिल में एक टीस सी उठ रही हैं...! क्‍यों मेरे साथ ऐसा हुआ...? क्‍यों भगवान ने एक हाथ से खुशियाँ देकर दूसरे हाथ से छीन ली...? अपनी 2 महीनो की बच्ची को छोड़के क्यो यहा पड़ा हूँ मैं...? अकेला...बिल्कुल अकेला...! दिल रो रहा हैं...! आँसू पलको के किनारों पे आके रुके हुए है....जैसे बाहर निकालने को बेताब...! रोना चाहता हूँ...! पर...पर...किसिका कंधा नही हैं मेरे पास रोने के लिए...! किसी के हाथ नही हैं उन आँसुओ को पोंछने के लिए जो बेताब हैं बाहर निकालने को| अकेला...बिल्कुल अकेला महसूस कर रहा हूँ मैं| रोने को बहुत दिल कर रहा हैं...बहुत| पर....फिर याद आता हैं, मर्द को कभी दर्द नही होता...मर्द कभी रोया नही करते| कौन कहता हैं मर्द को दर्द नही होता..? कौन कहता हैं मर्द कभी रोया नही करते...? देख लो मैं रो रहा हूँ...! उन लम्हों को याद करके जो पिछले साल मैंने अपने फॅमिली के साथ गुज़ारे थे| मैं रो रहा हूँ...! अपने बेटे को याद करके जो कभी मेरे बगैर खाना नही ख़ाता था..! मैं रो रहा हूँ अपनी बेटी को याद करके जिसे मैं 15 दिन की छोड़के यहाँ आया था...मैं रो रहा हूँ...सच्ची...मैं रो रहा हूँ.....!

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